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‘जन इतिहास’ की प्रतिष्ठा ही जिनकी प्रतिष्ठा है!

प्रदीप सक्सेना

उद्भावना, 114-115   

30 अगस्त की सुबह ‘बिपन चन्द्रा’ का निधन हो गया था। 31 की सुबह हस्बे मामूल श्रद्धांजलियों का तांता शुरू। सबसे पहले मैंने – “बिपन चन्द्रा: एक श्रद्धांजलि” को पढ़ा जो विख्यात मार्क्सवादी इतिहासकार प्रो. इरफान हबीब ने लिखी थी। बहुत ही मुकम्मिल, आत्मीय और उनकी इतिहास-लेखन में जगह को रेखांकित करती। विचारधारात्मक और वस्तुनिष्ठता से भरपूर। एक सहयात्राी के श्रम और दृष्टि को गैर भावुक ढंग से प्रतिष्ठित करते हुए।
लेकिन कहना होगा कि श्रद्धांजलि बालू में ढ़ाली गयी मूर्ति नहीं है। वह तो संगमरमर की तराश है। सख्त भी सुन्दर भी। जे.एन.यू. भी इतिहस का एक स्वप्न था। प्रगतिशीलता की भोर का एक सपना। सच होता हुआ। उस स्वप्न के भीतर बिपन चन्द्र ने देखा- कि-वे ‘‘जे.एन.यू. को एक ऐसे समुदाय के रूप में देखना चाहते हैं, जहां प्रोफेसर और चपरासी एक ही मेज पर बैठ सकेें।” इस स्वप्न में बिपन चन्द्रा का चिन्तन भी निहित है और कार्य भी। भले ही इसे कठोर जन फैशन के रूप में लें, यूटोपिया बतायें, जन-तंत्र का झरना मानें या क्रांतिकारी रूमान-प्रस्थान तो यह भिन्न था और भारत के तमाम विश्वविद्यालयों से अलग, तरल और अपेक्षात्मक था। क्या नये भारत के निर्माण में-वर्तमान भारत यानी राष्ट्रीय आंदोलन में आकार लेता भारत-इतिहास का सूर्योदय-अपना योगदान नहीं करता? महादेश प्रदत्त अस्मिता से मुक्त कैसे होता फिर? अनिल सील का साधरणीकरण ही बना रहता। प्रोफेसर और चपरासी के एक मेज पर होने की आकांक्षा वास्तविकता में परिणत हुई हो या न हुई हो दृष्टि में अन्तर्भुक्त अवश्य हो गयी थी। और बनी रही 30 अगस्त की सुबह तक। झिलमिलाता रहा एक राष्ट्रीय स्वप्न!
डी.यू., जे.एन.यू., जामिया और ए.एम.यू. अपने-अपने ढंग से इतिहास-लेखन में मानकीकरण का काम तो करते ही रहे हैं और मानकों के लिए आधार सामग्री भी जुटाते रहे हैं। व्यक्तिगत पसंद-नापसंद भी होती हैं। मतभेद भी। रिश्ते बनते बिगड़ते रह सकते हैं। लेकिन ‘जन से इतिहास का जो रिश्ता’ बिपन चन्द्रा ने तैयार किया वह ‘प्लाॅस्टर आॅफ पेरिस’ है। मजबूत भी खूबसूरत भी। विचारधारा का जल इसे बांधे है। आकार दे रहा है लेकिन अन्तर्निहित ढंग से। योग्यता और आकांक्षा का वृक्ष फल रहा है। बाज़ाब्ता लड़ाई तो बाद में शुरू हुई लेकिन कितने पहले दिल्ली के इतिहासकारों के जिक्र ने ‘‘कम्युनिलज़्म एण्ड दि राइटिंग आॅफ इंडियन हिस्ट्री’’ पर अपने पेपर तैयार किये थे। रोमिला थापर ने प्राचीन, हरबंश मुखिया ने मध्यकालीन और बिपन चन्द्रा ने आधुनिक इतिहासलेखन में कम्युनल रुझानों को प्रदर्शित किया। यह पैंफलेट रोमिला थापर के संपादन में पहले पहल अगस्त 1960 में पी.पी.एच. से आया था। इसका नौंवां संस्करण 2010 में हुआ। इससे ज़ाहिर है कि कि यह विचारधारात्मक सेवा आज भी जारी है। ‘‘हिस्टोरियंस आॅफ माॅडर्न इंडिया एण्ड कम्युनिल्म’’ पेपर ही बाद के ग्रंथों में विस्तार पाता गया है। मूलतः यह पेपर आॅल इंडिया रेडियो द्वारा आयोजित एक सेमिनार में पढ़ा गया था-1968 में। ‘‘माॅडर्न इंडिया’’ और ‘‘कम्युनलिज़्म’’ दोनों को समझने में यह पेपर सक्षम है।
यही समय था जब “भारत में आर्थिक राष्ट्रवाद के उदय और विकास’’ पर वे काम कर रहे थे। प्रो. इरफान हबीब ने इसे उनका ‘‘अग्रगामी’’ काम कहा है। इसे भी पी.पी.एच. ने ही प्रकाशित किया था 1966 में। सही रेखांकित किया है-प्रो. हबीब ने कि शुरुआती भारतीय राष्ट्रवाद की प्रमुख चिंताओं में से एक चिंता ‘विऔद्योगीकरण’ की प्रक्रिया को रेखांकित करना था। यह प्रक्रिया उपनिवेशवाद का उत्पाद थी। जब एक अमरीकी विद्वान मैरिस डी मौरिस ने औपनिवेशिक शोषण और खासतौर से विऔद्योगीकीकरण पर संदेह खड़े करते हुए एक लेख लिखा तो बिपन चन्द्रा ने 1968 में ‘इंडियन इकाॅनोमिक एण्ड सोशल हिस्ट्री रिव्यू’ में इसका मुंहतोड़ जवाब दिया था। ये कितने प्रेरणात्मक शब्द हैं! ये शब्द भी प्रो. हबीब के कितने प्रेरक हैं- ‘‘1959 में जब मैं पहली बार अलीगढ़ के एक भीड़ वाले टी हाउस में बिपन चन्द्रा से मिला था, तो मैंने गौर किया था कि एक व्यापक बौद्धिक काज़ के लिए ज़बर्दस्त प्रतिबद्धता है, कभी कम न होने वाला उत्साह है और ज़बर्दस्त विनोदप्रियता है, जिसमें ख़ुद अपने ऊपर हंसने की क्षमता भी शामिल थी।’’ ऐसे व्यक्तित्व का स्वामी ही यह कल्पना कर सकता था कि प्रोफेसर और चपरासी एक ही मेज़ पर क्यों न चाय पियें? घोर लोकतांत्रिक करवट ली जाए।
1977 में जब मैं इतिहासकार आर.एस.शर्मा के पास गया हुआ था काम मांगने तो उन्होंने मुझे कम्युनलिज़्म वाले लेख का अनुवाद करने को दिया था 1966 में। ‘‘1857 और भारतीय नवजागरण’’ वाली मेरी पुस्तक शर्मा जी ने बिपन चन्द्रा को ही भेज दी थी कि वे मुझे उस पर अपने विचार से अवगत कराएं। शर्मा जी ने मुझे भी इतिहास में काम करने के लिए प्रेरित किया था। बिपन जी ने ग़दर आंदोलन पर मेरे मत को बहुत पसंद किया था।
जिस तरह कम्युनलिज़्म वाले पैंफलेट को मैंने बहुत बुनियादी माना है उसी तरह मैं इन्क्वायरी  पत्रिका को बहुत महत्वपूर्ण मानता हूं। इतिहास-लेखन यात्रा में उसका स्थान अप्रतिम है। सांस्थानिक पत्रिकाओं से अलग मार्क्सवाद और इतिहास के अंतः संबंध को निरूपित और स्थापित करने वाली वह आधारशिला पत्रिका है। वह बिपन चन्द्रा का स्वप्न भी है और तर्क भी। व्यक्तियों की मेेधा का मान भी। कितनी ही ऐतिहासिक मान्यतओं और अवधारणाओं पर इस पत्रिका ने बहस संगठित की। जिसमें दलों और राजनेतओं से आशीर्वाद नहीं मांगा गया था। न ही कोई पुलिसिया प्रामाणिकता का सहारा लिया गया था, न राजनीतिक निष्कर्षों को इतिहास का मैदान जीतने दिया गया था। इसमें तथ्यों की छानबीन, लेखक पद्धति, दृष्टि की स्थापना और राष्ट्रीय परिस्थिति को महत्व देते हुए सुसंगत ऐतिहासिक भौतिकवाद को तरज़ीह दी गयी थी। अगर इससे इतिहासकारों को ठेस न पहुंचे तो विनम्रतापूर्वक मैं कह सकता हूं कि इंक्वायरी में इतिहास-लेखन-पद्धति को भी समृद्व किया और आज के अनेकों बड़े इतिहासकारों ने पहली लड़ाइयां इंक्वायरी के मैदान में ही जीतीं। ज़ाहिर है, यह मंच बिपन चन्द्रा के रिकाॅग्नीशन का मंच माना जा सकता है। प्रो. इरफान हबीब, आर.एस.शर्मा, देवराज चानना जैसे लोगों ने इसे बहुत शक्ति प्रदान की। इरफान हबीब साहब के दो महान लेख ‘‘दि सोशल डिस्ट्रीब्यूशन आॅफ लैंडेड प्रापर्टी इन दि ब्रिटिश इंडिया: ए हिस्टोरिकल सर्वे’’ तथा ‘‘पोटेंशियलिटीज़ आॅफ कैपिटलिस्टिक डेवलेपमेंट इन दि एकाॅनमी आॅफ मोगल इंडिया’’ मैंने मूल इंक्वायरी  में पढ़े। बिपन सा’ब का भेंट किया हुआ वह अंक आज भी मेरे निजी पुस्तकालय की शोभा है।
बिपन साहब राष्ट्रीय आंदोलन को यानी भारत के स्वाधीनता संघर्ष को आधुनिक समाज के सबसे बड़े आंदोलनों में गिनते हैं। गिनना चाहिए। क्योंकि ‘विभिन्न विचारधाराओं और वर्गों के करोड़ों लोगों को इस आंदोलन ने राजनीतक रूप से प्रेरित किया और शक्तिशाली औप्निवेशिक साम्राज्य को घुटने टेकने के लिए विवश किया।’ वे यह भी मानते थे कि वास्तव में भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन अर्द्धलोकतांत्रिक या लोतांत्रिक पद्धति के राजनीतिक ढांचे को सफलतापूर्वक बदला जा सकता है। यानी भारत का राष्ट्रीय आंदोलन ऐसा एकमात्र आंदोलन है जिसमें दृष्टिकोणों के टकराव का ग्राम्शी द्वारा प्रतिपादित सैद्धांतिक परिपे्रक्ष्य सफलतापूर्वक अमल में लाया गया।-जहां राजसत्ता पर क्रांति के ज़रिए एक खास ऐतिहासिक क्षेत्र में कब्ज़ा नहीं किया गया बल्कि इसके विपरीत नैतिक, राजनीतिक और विचारधारात्मक, तीनों ही स्तरों पर लंबे जनसंघर्ष चलाकर इसको हासिल किया गया; जहां अनेक वर्षों में धीरे-धीरे जवाबी नेतृत्व की शक्ति संचित की गयी तथा जहां संघर्ष और शांति के दौर बारी-बारी से आते-जाते रहे। कहना न होगा-
-उन्होंने, साम्राज्यवादी इतिहस-लेखन की उच्च स्तरीय आलोचना की।
– उनहोंने, साम्प्रदायिक इतिहास लेखन पर निंरतर प्रहार किये।
-उन्होंने, सबाल्टर्न अध्ययन की सारभूत वर्ग विरोधी धारणाओं का विरोध किया।
-उन्होंने, मार्क्सवाद में सुधार का क्रम जारी रखा।
-उन्होंने, राष्ट्रवादी संघर्षों के सार को प्रगतिशील पाया। ये उनके पंचशील कहे जा सकते हैं।
वे अपने दृष्टिकोण के आर-पार भी देख सकते थे। उनका अपने बारे में दिया गया यह मत मुझे बहुत आकर्षित करता हैः ‘‘हमारा अपना दृष्टिकोण, जहां तक हम समझते हैं, मोटे तौर पर मार्क्सवादी पंपरा के अंतर्गत रहकर निम्नांकित मुद्दों की स्थिति का पता लगाना हैः
उपनिवेशवादी भारत में अन्तर्विरोधों का स्वरूप, मुख्य तथा गौण अंतर्विरोधों का संबंध, आंदोलन का वर्ग चरित्र, बुर्जुवाजी तथा अन्य सामाजिक वर्गों के बीच संबंध तथा भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस तथा उसका नेतृत्व जैसे वर्ग तथा पार्टी के बीच संबंध, संघर्ष के विभिन्न रूपों और वर्ग चरित्र (इसमें अहिंसात्मक रूप भी हैं।) विचारधारा, रणनीति तथा आंदोलन का जनाधारित स्वरूप आदि। अर्थात् उपर्युक्त पक्षों की ऐसी रूपरेखा के अंतर्गत परीक्षा की गयी है जो रजनी पामदत्त और ए.आर.देसाई. सहित मौजूदा परंपरागत मार्क्सवादी दृष्टिकोणों से अनेक बातों में अलग है।
यही अलग होना उन्हें इस निष्कर्ष तक ले गया है कि ‘‘भारत में मार्क्सवाद: संपूर्ण संशोधन की आवश्यकता है’’। यह एक महनीय प्रस्ताव था। मेरे संज्ञान में शायद किसी भारतीय इतिहासकार द्वारा, इतिहास-लेखन के बाहर, इतिहास-निर्माण का यह सर्वाघिक गंभीर आत्मविवेचनात्मक प्रेक्षण है। सांस्थानिक मार्क्सवाद इससे सहमत हो या न हो-है यह ज़रूरी! आज तो और भी।
पंजाब में उनमें अमृतसर में पंजाबी जातीयता की तरंगों से अभिभूत होते मैंने देखा था। दर्शन सिंह कनैडियन के साथ मैंने उन्हें देखा था। विषय था-‘‘क्या दहशतगर्द गुरु सिख है?’’ दिल्ली मेें भी उनके माध्यम से पंजाब पर बोलते मैंने सुना था।
साम्प्रदायिकता की गहन विवेचना करते हुए उन्हें बड़े सिद्धांतकार के रूप में मैंने पाया था। दार्शनिक स्तर तक उन्होंने इस विश्लेषण को पहुंचाया है। सैफुद्दीन किचलू की जीवनी की अनुवाद भी मैंने उनके एक आग्रह को रखने के लिए ही किया था। अमृतसर के प्रसंग में यह आग्रह आया था।
इतिहासकार-रूप उनका देश-प्रेम और जन-प्रेम की लहरों ने गढ़ा है। उनका फ्रेमवर्क विशाल और दृष्टि गहन है। उनका श्रम प्रभूत और संकल्प सघन है। उनकी मार्क्सवाद में निष्ठा असंदिग्ध और उसे विकसित करने में वे सक्षम हैं। वे इतिहास को पुराण में बदलने के लिए तत्पर दीनानाथ बत्रा युग को रोक पाने में समर्थ प्रतिभाओं के निदेशक बनने की सामर्थ्य रखते हैं। भले ही वह 86 साल के हों, किसी पद पर हों या न हों, उनके स्मारक उनके कार्य हैं और उनसे पथ आलोकित करने वाली रौशनी फूट रही है। बस यह वामपंथ औपचारिक न हो, यही कामना है।

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