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बिपन चन्द्र: एक युग का अवसान

Bipin Tiwari

बिपिन तिवारी

हंस, अक्टूबर 2014 

31 अगस्त 2014 की अलसुबह इतिहासकार प्रोफेसर बिपन चन्द्र नहीं रहे। बिपन चन्द्र का जाना एक सामान्य खबर नहीं है। उनका जाना एक संस्था का जाना है। वह संस्था जिसने इतिहास लेखन की एक अलग परम्परा शुरू की और भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का एक नए तरह से पाठ किया। बिपन चन्द्र के पहले तक राष्ट्रीय आंदोलन की जो समझ विकसित की गई थी वह माक्र्सवादी इतिहासकारों और साम्राज्यवादी इतिहासकारों की देन थी। माक्र्सवादी इतिहासकार जहां इसके चरित्र को बुर्जुआ सिद्ध कर रहे थे और आजादी को झूठी आजादी मान रहे थे, वहीं साम्राज्यावदी इतिहासकार राष्ट्रीय आंदोलन को जन आंदोलन मानने को तैयार नहीं थे। बिपन चन्द्र खुद माक्र्सवादी थे लेकिन उनका माक्र्सवाद रजनी पामदत्त जैसे कम्युनिस्ट पार्टी के माक्र्सवादियों से अलग था। इसीलिए वह आजादी को झूठी कहने की पार्टी की जो लाइन थी उसको अस्वीकार करते हैं। इसके बारे मंे वह एक किस्सा सुनाते थे कि जब वह पीएच.डी. कर रहे थे तो उन्होंने प्राक्कल्पना ;भ्लचवजीमेपेद्ध जो बनाई थी और जो तथ्य मिल रहे थे वह उसके विपरीत थे, इस समस्या को उन्होंने अपने दोस्त प्रसिद्ध कम्युनिस्ट नेता मोहित सेन से बताया। मोहित सेन ने कहा कि जो तथ्य मिल रहे हैं उसके हिसाब से अपने निष्कर्ष प्रस्तुत करो। इस सूक्ति को वह अपने जीवन भर अपनाए रहे, जिसकी कीमत भी उनको विभिन्न रूपों में चुकानी पड़ी। उनको कांग्रेसी इतिहासकार कहकर अपमानित किया गया जिसमें कम्युनिस्ट पार्टी के लोग भी शामिल थे।
साम्राज्यवादी इतिहासकारों के जवाब में उनका तर्क था कि भारत के राष्ट्रीय आंदोलन की शुरुआत जरूर कुछेक बौद्धिकों ने की थी परंतु आगे चलकर इसका स्वरूप विकसित होता चला गया। जिसमें किसान, व्यापारी, मजूदर आदि समाज के सभी लोग शामिल थे। खासतौर से गांधी के आने के बाद उनके आंदोलनों में इस तथ्य को देखा जा सकता है। बिपन ने अपनी इतिहास की समझ केवल चुनिंदा किताबों या पुस्तकालयों-अभिलेखागारों में बैठ कर ही नहीं बनाई। अस्सी के दशक में अपने छात्रों-सहयोगियों के साथ टीम बनाकर पूरे देश में घूमे। छोटे शहर, कस्बे और यहां तक की गांवों में भी गए। स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों से साक्षात्कार लिए और उन सबकी समझ को अपनी समझ से मिलाया। यह साक्षात्कार अभी छप नहीं सके हैं, लेकिन जिस दिन दुनिया के परदे पर भारतीय जनमानस की यह आवाज सामने आएगी तो लोग और बेहतर समझ सकेंगे कि बिपन चन्द्र होने का क्या मतलब था और है।
बिपन चन्द्र ने साम्प्रदायिकता के खतरे को लेकर इतिहासकारों में सबसे आक्रामक ढंग से काम किया है। वह आम जनता में बैठे सांप्रदायिक विचारों की परत-दर-परत पड़ताल करते हैं। इसके पीछे वह ब्रिटिश राज के इतिहास लेखन को उत्तरदायी मानते हैं। जिसे आगे चलकर साम्प्रदायिक शक्तियों ने और समृद्ध किया और उसका जनता में प्रचार किया, जिसके भयानक परिणाम भारत की मिली-जुली संस्कृति को उठाने पड़े। बिपन चन्द्र ने साम्प्रदायिकता को विचारधारा के रूप में विवेचित किया है, जो धीरे-धीरे लोगों को साम्प्रदायिक बनाती है। जिसे आजादी के बाद के समय में देखा जा सकता है। राम मंदिर आंदोलन के समय जिस तरह से राम के मर्यादा पुरुषोत्तम रूप की जगह संहारक की छवि निर्मित की गई वह इसी साम्प्रदायिकता का ही नतीजा थी। अब राम का ध्यान आते ही उनकी छवि धनुष की प्रत्यंचा पर तीर चढ़ाए हुए संहार के लिए आतुर रूप में दिखाई पड़ती थी।
बिपन चन्द्र का मानना था कि साम्प्रदायिकता का जिस तरह से मुकाबला राष्ट्रीय आंदोलन और आजादी के बाद के वर्षों में नेहरू ने किया उस तरह से बाद में कांग्रेसी और गैर कांग्रेसी राजनेताओं ने नहीं किया। एक समय ऐसा भी आया कि जब कांग्रेस विरोध के नाम पर धर्मनिरपेक्ष, वामपंथी राजनेता भी साम्प्रदायिक शक्तियों के साथ खड़े हो गए, जिससे साम्प्रदायिक शक्तियों को धीरे-धीरे वैधता मिलती चली गई। जो आगे चलकर बाबरी मस्जिद विध्वंस और गुजरात के भीषण दंगों के रूप में प्रकट हुई।
प्रोफेसर बिपन चन्द्र के लिए इतिहास लेखन एक जिम्मेदारी थी। जिसे एक किस्से के जरिए देखा जा सकता है। एक बार एनसीआरटी की ओर से बच्चों के लिए इतिहास लिखने की जिम्मेदारी बिपन चन्द्र को मिली। बिपन ने प्रसिद्ध इतिहासकार रोमिला थापर से प्राचीन भारत पर किताब लिखने के लिए कहा। रोमिला थापर ने मना कर दिया। उन्हें बच्चों के लिए लिखना बहुत कठिन लग रहा था। इस पर बिपन ने कहा कि यदि तुम आने वाली पीढ़ी के लिए कुछ भी सरोकार रखती हो तो तुमको जरूर लिखना चाहिए। यह थी उनकी इतिहास के प्रति निष्ठा।
इसके अतिरिक्त बिपन चन्द्र ने समकालीन मुद्दों को लेकर भी इतिहास लेखन किया है, जिसमें आपातकाल, पंजाब का आतंकवाद आदि प्रमुख हैं। आपातकाल को लेकर उन्होंने जेपी और इंदिरा गांधी दोनों की भूमिका की आलोचना की है। उनका मानना है कि दोनों नेताओं ने गैर संवैधानिक रास्ता अपनाया था, जिसके कारण ही दक्षिणपंथी शक्तियों को मजबूत होने का मौका मिला। हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा में में जन्मे (1928) बिपन चन्द्र की शिक्षा दीक्षा फोरमैन क्रिश्चियन काॅलेज लाहौर, स्टैन फोर्ड यूनिवर्सिटी अमेरिका और दिल्ली विश्वविद्यालय में हुई। वह दिल्ली विश्वविद्यालय, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, इंडियन हिस्ट्री कांग्रेस, नेशनल बुक ट्रस्ट आदि संस्थाओं से जुड़े रहे। बिपन चन्द्र के इतिहास लेखन से न केवल इतिहास पढ़ने वालों को एक नई दिशा मिली है अपितु इसका लाभ समाज विज्ञान, मानविकी पढ़ने वालों को भी मिला है। जिसे उनकी पुस्तकों के हिंदी संस्करणों से प्रमाणित किया जा सकता है।

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