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चंद्र का जाना एक युग का अंत

प्रभात खबर, 31 अगस्त 2014  (प्रोo आदित्य मुखर्जी से बातचीत पर आधारित)

इतिहासकार बिपन चंद्र का निधन एक युग का अंत है. लगभग 50 सालों तक इतिहास के क्षेत्र में बेहतरीन काम के कारण वे आजादी के बाद भारत के प्रमुख इतिहाकारों में गिने जाते हैं. भारत के वे पहले ऐसे इतिहासकार हैं, जिनके नाम पर संस्था बनी है. अर्थशास्त्र से लेकर गांधी, नेहरू, राष्ट्रवाद, सांप्रदायिकता पर उन्होंने कई किताबें लिखी हैं. वर्ष 1960 से ही से राष्ट्रवाद के उभार, साम्राज्यवाद से स्वतंत्र राष्ट्र के तौर पर बदलाव के संभावित तरीके, भारत के पूंजीवादी समाज का स्वभाव और उसका साम्राज्यवाद से संबंध, राष्ट्रवाद का गांधी दर्शन, आजादी के बाद भारत का निर्माण, जेपी आंदोलन और आपातकाल पर कई किताबें लिखीं.

वे छात्र जीवन से ही समाज के वंचित तबकों के हितों के प्रति संवेदनशील थे. स्टेनफोर्ड विश्वविद्यालय में 1940 के दशक में उनका झुकाव वाम आंदोलनों और मार्क्सवाद के प्रति हुआ. इस झुकाव के कारण वे इंजीनियरिंग की पढ़ाई छोड़ अर्थशास्त्र और इतिहास के छात्र बन गये. भारत लौटने के बाद वे वाम आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाने लगे. उनकी सोच थी कि अपने बौद्धिक ज्ञान से जमीनी हकीकत को समझ कर बदलाव लाया जा सकता है.

साम्राज्यवाद और सांप्रदायिकता पर उनका शोध ही उन्हें इनका सबसे बड़ा आलोचक बनाने में कामयाब रहा. उसी तरह राष्ट्रीय आंदोलन को सही परिपेक्ष्य में समझने के कारण ही वे समाज के प्रमुख विरोधाभासों के सही समाधान के बारे में बता पाये. वे ताउम्र आंदोलनकारी स्कॉलर रहे और उनके ज्ञान को वह नहीं समझ सकता जो उनकी सामाजिक बदलावों के प्रति प्रतिबद्धता को नहीं परख सकता.

वाम विचारों के प्रति झुकाव रखनेवाले अन्य विद्वानों से वे इस मायने में अलग थे कि वे किसी अंतर्द्वद्व के शिकार नहीं होते थे. वे हमेशा इस बात के प्रति सजग रहे कि वे वामपंथ के परंपरागत सोच के शिकार न बन जायें. वे कभी भारत के वामपंथी पार्टी लाइन से नहीं बंधे रहे और वैश्विक स्तर पर वामपंथ की कमियों की आलोचना भी करते रहे. वे अपने लेखन में भी इस विचार को अपनाते रहे और समय के साथ इसमें बदलाव करने से कभी पीछे नहीं रहे. इस कारण उन्हें वामपंथियों से आलोचनाओं का भी सामना करना पड़ा, लेकिन वे कभी डिगे नहीं. यही वजह रही कि आधुनिक और समकालीन भारत को लेकर उन्होंने कई ऐसी किताबें लिखी हैं, जो किसी दूसरे के वश की बात नहीं थीं.

प्रो बिपन चंद्र ने इतिहासकारों की एक ऐसी टीम तैयार की, जिसने कई क्षेत्रों में नये विचारों के साथ कई अहम दस्तावेज पेश किये. उनके संपादकीय नेतृत्व में टीम ने मोनोग्राफ की सीरीज का प्रकाशन किया. शिक्षण क्षेत्र के अलावा बिपन चंद्र सामाजिक और राजनीतिक आंदोलनों में भी सक्रिय रहे. इसका बेहतरीन उदाहरण है दिल्ली हिस्टोरियन ग्रुप का गठन. इस ग्रुप के गठन का मकसद तत्कालीन भाजपानीत एनडीए सरकार के दौरान हिंदू सांप्रदायिक ताकतों द्वारा इतिहास के पुर्नलेखन की कोशिशों को नाकाम करना था.

वर्ष 1979 में उनके लेखों का संग्रह नेशनलिज्म एंड कोलेनियज्म इन माडर्न इंडिया में अभिव्यक्त विचार आज भी प्रासंगिक हैं. उनके इस किताब की लाखों प्रतियां बिकीं. चंद्र मानते थे कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की अगुवाई में चलाये गये राष्ट्रीय आंदोलन में देश के सिर्फ संभ्रात वर्ग की भागीदारी नहीं थी, बल्कि इसमें समाज के सभी वर्ग के लोग शामिल थे और वे सामाजिक बदलाव चाहते थे. भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन ब्रिटिश, रूसी, अमेरिकी, क्यूबा और वियतनाम के क्रांतिकारी आंदोलनों जैसा ही था. उन्होंने लिखा है कि अहिंसा को आजादी का हथियार बनाने की वजह किसी वर्ग को फायदा पहुंचाना नहीं था, बल्कि उस समय के ताकतवार शासकों से लड़ने का सबसे अच्छा तरीका था. अगर शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे लोगों पर ब्रिटिश सरकार बर्बर कार्रवाई करती तो उसे वैश्विक स्तर पर आलोचना झेलनी पड़ती और कोई कार्रवाई नहीं करने पर उसके अधिकारों के कमजोर होने का संदेश जाता. इससे ब्रिटिश सरकार उलझन में फंस गयी थी.

प्रो चंद्र का मानना था कि गांधीजी की धर्मनिरपेक्षता का मतलब राजनीति को धर्म से अलग रखना था. एक महत्वपूर्ण लेख में उन्होंने लिखा कि राज्य को सभी धर्मों के प्रति निष्पक्ष रवैया अपनाना चाहिए और किसी समुदाय व व्यक्ति के साथ भेदभाव नहीं करना चाहिए. मौजूदा समय में देश में जैसा माहौल है, उसमें चंद्र के विचार काफी प्रासंगिक हैं. बढ़ता सांप्रदायिक तनाव इस बात की ओर इशारा करता है कि देश में धर्मनिरपेक्ष मूल्य कमजोर हुए हैं. चंद्र ने गांधी के धर्मनिरपेक्ष मूल्यों को सही मानते हुए लिखा है कि उनकी सोच में दिखावा नहीं था.

इतिहासकार के तौर पर बिपन चंद्र का योगदान अहम रहा है. उनके नेतृत्व में नेशनल बुक ट्रस्ट के कामकाज में भी व्यापक बदलाव दिखा. उनकी आखिरी किताब 2012 में द मेकिंग ऑफ माडर्न इंडिया : फ्रॉम मार्क्स टू गांधी प्रकाशित हुई थी. उसके बाद वे भारत में जातिवाद के बढ़ने पर लिखने का मन बना रहे थे. भारत में उनके अलावा शायद ही ऐसा इतिहासकार हुआ है जो अर्थशास्त्र से लेकर जाति, सांप्रदायिकता, राष्ट्रीय आंदोलन जैसे विविध विषयों को गहराई से समझने और समझाने में इस कदर कामयाब रहा हो.

(विनय तिवारी से बातचीत पर आधारित)

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